एक बार की बात है... लगभग 2600 साल पहले, हिमालय की तलहटी में कपिलवस्तु नाम का एक छोटा-सा राज्य था। यहाँ शाक्य क्षत्रियों का राज्य था। यहीं पर राजा शुद्धोधन और रानी महामाया रहते थे।
वैशाख पूर्णिमा के दिन, रानी महामाया अपने पीहर देवदह जा रही थीं। रास्ते में लुम्बिनी नामक सुंदर वन में उन्होंने एक पीपल के पेड़ के नीचे विश्राम किया। वहाँ उन्होंने एक सफेद हाथी का सपना देखा जो उनके गर्भ में प्रवेश कर रहा था। उसी दिन, उन्होंने एक पुत्र को जन्म दिया।
✨ "देवों के देव ने जन्म लिया — सिद्धार्थ! जिसका अर्थ है — "जिसने अपना लक्ष्य प्राप्त कर लिया" ✨
कहा जाता है कि जन्म के तुरंत बाद, छोटा सिद्धार्थ सात कदम चला और कहा — "मैं इस जन्म में अंतिम बार पैदा हुआ हूँ, अब मेरा जन्म-मरण का चक्र समाप्त होगा।"
जन्म के कुछ दिनों बाद ही माता महामाया का स्वर्गवास हो गया। तब बुद्ध की मौसी महाप्रजापति गौतमी ने उनका पालन-पोषण किया।
राजा शुद्धोधन ने एक ऋषि असित को बुलाया, जिन्होंने बालक के शरीर पर 32 लक्षण देखे और भविष्यवाणी की — "यह बालक या तो चक्रवर्ती सम्राट बनेगा, या महान संन्यासी (बुद्ध)"।